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विश्व भर में शुगर(मधुमेह)से ग्रसित रोगियों की लगभग 35% मौतें शुगर बढ़ने के कारण नही बल्कि गलत दवा के खाने से शुगर घटने के कारण होती हैं,कारण बताऊँगा क्यों

मित्रों नसमस्कार *सर्वप्रथम तो आप सभी पाठकगणों को मेरे मधुमेह संबंधी जागरूकता लेख को पसंद करने पर हार्दिक धन्यवाद, खासकर उन्हें जो मेरे लेख को सरसरी नज़र से न देख उसे सटीकता से पढ़ फॉरवर्ड भी करते हैं, मुझे बहुत खुशी है कि जब मेरे मधुमेह संबंधी लेख पढ़कर रोगी उनसे प्रभावित होकर हमे अपना मधुमेह का इलाज कराने के लिए चुनकर उस वर्ग से अलग खड़े हो जाते हैं जो हमेशा यह मानता आया है कि एलोपैथी चिकित्सक ने जो दवायें दे रखी है वही सही चिकित्सा है।जबकि हम हमेशा कहते आये हैं कि शुगर(मधुमेह)को एलोपैथी का पहचानने का इतिहास मात्र 103 वर्ष पुराना है जब सन 1913 में बॉस्टन के फ्रेडरिक मैडिसन एलन ने सबसे पहले शुगर रोग की पहचान कर उसके लिए कुछ दवाओं का ईजाद किया था जिसे 'एलन ट्रीटमेंट फॉर डायबिटीज' कहा जाने लगा था।

जबकि आधुनिक युग में डायबीटीज़ कही जाने वाली इस बीमारी को हज़ारों वर्ष पूर्व चरक जैसे आयुर्वेद के महान मनीषियों ने प्रमेह के 20 प्रकार के अंतर्गत मधुमेह(शुगर) को परिणित कर दिया था व हृदय प्रदेश में अकड़न और ग्रहण की इच्छा, खाने की और अधिक प्रवृति, अनिद्रा,पैरों में कंपन जैसे लक्षण के आधार पर मधुमेह को वातज प्रमेह की श्रेणी में रखा था, शुगर के रोगी की आज भी बड़े से बड़ा चिकित्सक पहले इन लक्षणों के आधार पर पहचान करता है व इस वहम के चलते ही शुगर जाँच कराने को कहता है

खैर आज मेरा मुख्य उद्देश्य यह समझाने का था कि क्यों शुगर के बहुत सारे रोगियों कि मृत्यु अचानक शुगर घटने(हाइपोग्लासीमिया)के होती है वो यूँ कि वास्तविकता में वो शुगर का रोगी नही बल्कि प्रमेह रोगी होता है और केवल मशीनी रीडिंग के आधार पर वह स्वयं को शुगर का रोगी मान बैठता है और शुगर की वो दवायें लगातार खाता रहता है जो डॉ ने उसे कभी 'किसी जमाने में लिख दी थी' व वास्तविकता में उसे अब उन दवाओं की आवश्यकता होती ही नही, लेकिन अफ़सोस ऐसे अधिकतर केसों में रोगी का लगातार विवेचन(फॉलो अप) व डॉ साहब के पास समयाभाव होने के कारण बेचारा रोगी प्राण त्यागता है।* *आजकल स्टेटस सिंबल के चलते रोगी भी तो ऐसे चिकित्सक से इलाज कराना शान समझता है जिसके पास मशीनों का जमावड़ा हो और बात करने का समय न हो

आयुर्वेदानुसार विभिन्न लक्षणों के आधार पर किसी को मधुमेह या प्रमेह का रोगी निश्चित किया जाता है व केवल मशीनी रीडिंग का कोई मायने नहीँ, लक्षणों और रोग इतिहास का सटीकता से आँकलन करने पर केवल सतत पठन-पाठन करने वाला कुशल आयुष चिकित्सक ही पहचान सकता है कि आपको मधुमेह(शुगर)है या प्रमेह व उस ही अनुसार रोगी की दिनचर्या, आहार-विहार आदि निर्धारित कर उपचार चलाया जाता है जिससे रोगी अन्य साधारण मनुष्यों की भांति पार्श्व प्रभाव(साइड इफ़ेक्ट)रहित औषधी युक्त जीवन यापन कर सकता है

डा. निशान्त गुप्ता आयुष - बी.फ़ार्म,एम.आयु,एन.डी, पी.एच.डी(आयु),एम.डी - (पंचगव्य)*

आयुर्वेद के इस दृढ,अकाट्य चिकित्सा आधार को 'अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन' व 'इंटरनेशनल डायबिटीज एसोसिएशन' तक ने अपने विभिन्न शोधों में सही मानकर 'हर्बल रेमेडीज'(प्राकृतिक दवाओं)को एक निरापद विकल्प मानकर मधुमेह का इलाज इससे संबंधित चिकित्सक से कराने के लिए recommend किया